हवाओं को पहाड़ों के सामने रुख बदलते देखा है।
ज़िद्दी नदियों के लिए पहाड़ो को भी टूट ते देखा है।
कभी पीठ में खंजर नही मारेंगे ऐसे मैंने दोस्त बना रखे थे।
उसको मैंने खंजरों में धार लगाते देखा है।
पत्नियों को तो सदा कामयाब इंसान मिले है।
पूरुषों के जीवन का संघर्ष तो उनकी प्रेमिकाओं ने देखा है।
हँसते चेहरों के पीछे आँधियों को पलते देखा है।
रातों की तन्हाई में सूरज को भी ढलते देखा है।
कभी वक़्त के साथ जो हर मोड़ पे साथ चलता था,
उसे भीड़ में मेरे नाम से मुँह मोड़ते देखा है।
हर रिश्ता आईने-सा साफ़ नहीं होता, ये सीखा है,
कुछ चेहरों को मुस्कान की ओट में झूठ बोलते देखा है।
अब साजिशें भी साये की तरह साथ चलती हैं,
कभी अपनी परछाई को भी खंजर लिए देखा है।
जिसने अपनी रोटी से टुकड़े मुझे खिलाए थे,
उसी माँ को कई रातों तक भूखे सोते देखा है।
फटे आँचल में भी दुआओं की दौलत रखती थी,
मैंने उस हाथ को चूल्हे की आग में जलते देखा है।
रूकमणी को तो मिल गए कृष्णा द्वारिकाधीश बन कर
मीरा का मोहन के लिए जहर पीते, और राधा ने कान्हा के लिए इंतजार देखा है।
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