महायोद्धाओं की सदियों की बीती बात पुरानी है
कुरुक्षेत्र की लाल मिट्टी उस महाभारत की निशानी है
युद्ध की इच्छा रखने वाले सभी योद्धा समर भूमि में आ खड़े हुए।
गदा, तलवार, धनुष बाण, और भी अस्त्र शस्त्र सबके रथ में थे पड़े हुए।
अर्जुन बोला माधव से मुझे अपने रथ के घोड़ो आज्ञा दीजिए
दोनो सेनाओं में मध्य अपने रथ को खड़ा कीजिये।
ध्यान से देखूं इन चहरो को वो अधर्मी कौन थे
हो रहा था चीर हरण तब कौनसे योद्धा मौन थे।
मैं भी तो देखूं किन किन योद्धा से मुझको लड़ना है
रक्त की नदियां बहायेगा आज तुम्हारा ये कौन्तेय।
तब माधव ने बातों बातों में कुछ जान लिया
रथ अपना ले जाकर योद्धाओं के मध्य खड़ा किया
हल्की मुस्कान से बोले माधव अर्जुन को
यही हैं "वो कौरव" जिन्होंने तुमको बड़ा किया।
माधव ने अर्जुन के छिपे कुल प्रेम को पहचान लिया,
कौरव नाम सुनते ही अर्जुन के मन मे भी कुटुम्भ स्नेह जाग गया।
मानो माधव अर्जुन को एक निमित बनाएंगे।
लोक कल्याण के लिए माधव अब गीता सुनाएंगे।
अर्जुन बोला माधव से कैसे मैं अपनो रक्त बहाऊँ
जिनके गोद में खेला मैं कैसे उनपर बाण चलाऊ
ना जाने क्यों मेरे हाथ से गांडीव फिसल रहा
पितामह को देख कर क्यों जी मेरा मिचल रहा
क्या यह युद्ध टल नही सकता?
यह बुरा कर्म मैं कर नही सकता
माधव तुम्ही कोई राह दिखलाओ
अपनो को मार कर मैं जी नही सकता
यह सब कहकर अर्जुन ने गांडीव छोड़ दिया
उदासीन मुख को माधव से मोड़ लिया
सर अपना पकड़ कर सोच में पड़ गया अर्जुन
मुझसे नही होगा अब युद्ध कहकर रथ के पीछे जाकर बैठ गया।
ऐसे नही मानेगा अर्जुन यह माधव ने जान लिया
फिर माधव ने की अमृत की वर्षा और गीता का ज्ञान दिया
*सांख्य योग*
बोले माधव
क्यों व्यर्थ ही चिंता करते हो
क्यों व्यर्थ ही तुम डरते हो
आत्मा कभी न पैदा हुई न मरती है
फिर क्यों व्यर्थ ही आंसू भरते हो
इनमे से ना कोई तुम्हारा भाई और ना ही कोई दादा है
धर्म के खातिर सोच लो ना इनसे कोई नाता है
आकाश, पानी, हवा, अग्नि और धरती से बना शरीर है
आत्मा कभी मरती नही शरीर तो बस एक ढांचा है
कर्म ही तुम्हारे बस में है क्यों कर्म का त्याग करते हो
धर्म के इस युद्ध मे क्यों नपुंसक जैसी बातें करते हो
आत्मा तो वस्त्र की तरह नए शरीर को धारण कर लेगी पार्थ
जय, पराजय, पाप पुण्य के मोह जाल में क्यों तुम फसते हो?
इस युद्ध मे जीत कर या तो पृथ्वी का भोग प्राप्त होगा।
मर भी गए तो भी तुम जैसे वीरों को स्वर्ग प्राप्त होगा लेकिन
कायर जैसे युद्ध ही नही करोगे तो अपकीर्ति होगी
बताओ पार्थ उस से तुम्हे क्या प्राप्त होगा?
ऐसा नही है इस से पहले काल मे हम नही थे या आगे काल में हम नही हों
तुम पहचान भी नही पाओगे अगले जन्म सोचोगे की शायद ये वहीं हों
जन्मे हुए का मरना निश्चित है और मेरे हुआ का जन्म होना भी
इस प्रकार शोक करने के योग्य तो तुम कदापि नही हो
*कर्मयोग*
अब मैं इस कर्म बंधन से मुक्त होने का रहस्य बताता हूँ
ध्यान से सुनो पार्थ अब मैं तुम्हे *कर्म योग* सुनाता हूँ।
हे अर्जुन जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं
जो कर्म फल के प्रशंशक हो रहे हैं
और जो स्वर्ग जाने के इच्छुक हो रहे हैं
और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी वस्तु ना मान रहे हैं
उनको अविवेकी ना कहेंगे तो क्या कहेंगे?
भोग विलास, ऐश्वर्य जिनका पाना हो लक्ष्य वो परमात्मा से कैसे मिलेंगे?
मैंने अपने भक्तों को दिया ये प्यारा संसार है
नवीन कर्म करना ही उनका अधिकार है
फल की चिंता कभी ना करना
निष्काम कर्म एक सरल मोक्ष का द्वार है
सकाम से तू अपने पाप और पूण्य बढ़ाएगा
लेकिन निष्काम कर्म से पाप पूण्य से मुक्त हो जायेगा
जो दुःख के समय दुखी और सुख के सुखी ना हो
वही परम योगी इस जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जायेगा
इस समत्वरूप बुद्धियोग को अपनाते रहना
इसकी रक्षा का उपाय भी सदा ढूंढते रहना
समत्व योगी बन कर्म फलों का त्याग करो तुम
फिर तो बस सीधा मेरे पास आने की तैयारी कर लेना
जिस काल में तू बुद्धि मोह रूप दल दल को पार कर जायेगा
उस समय तू इह लोक और परलोक से भी पार हो जायेगा
और जब तेरी बुद्धि परमात्मा में हो जाएगी अचल और स्थिर
तब तू योग को प्राप्त हो जायेगा अर्थात परमात्मा से नित्य संयोग हो जायेगा
फिर अर्जन के मन भी कुछ आया विचार
और पूछे माधव से प्रश्न चार
समाधि में स्थित, परमात्मा को प्राप्त स्थिर बुद्धि पुरुष क्या लक्षण दिखलाता है?
वो कैसे चलता है वो कैसे बैठता है और कैसे बतलाता है?
पार्थ अब मैं तुम्हे पहले प्रश्न का उतर बतलाता हूँ
स्थिर बुद्धि वाला जैसे लक्षण दिखता है वो समझाता हूँ
जिस काल में मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओ को जो त्याग देता है
शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, मान प्रतिष्ठा, राग द्वेष से ऊपर उठ जाता है
जिसे अनुकूल वस्तु खोने का और प्रतिकूल वस्तु के आने का ना डर होता है
जिसके अन्दर कामना, इच्छा और तृष्णा का आभाव होता है
और जो आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है वही स्थिर बुद्धि पुरुष होता है
अब मैं पार्थ दुसरे प्रश्न का उतर बतलाता हूँ
स्थिर बुद्धि पुरुष बोलता कैसे है समझाता हूँ
दुखों की प्राप्ति पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता हो
जिसने वाणी पर नियंत्रित कर लिया हो
जिसने भय और क्रोध को जीत लिया हो
जो सुख मिलने पर पागल नहीं हो जाता है
ऐसा ही पुरुष स्थिर बुद्धि वाला कहलाता है
अब मैं पार्थ तीसरे प्रश्न का उतर बतलाता हूँ
स्थिर बुद्धि पुरुष बैठता कैसे है समझाता हूँ
कछुवा सब और से अपने अंगो को जैसे समेटता है
वैसे ही पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटाता है
जो पुरुष विषयों को ग्रहण ना करके आसक्ति को काबू भी कर लेता है
लेकिन उनके मन में रहने वाली आसक्ति से निवर्त नहीं हो पाता है
परन्तु स्थिर बुद्धि वाला पुरुष आसक्ति का भी नाश कर देता है
अर्जुन बोला माधव से इस आसक्ति से क्या परेशानी हो जाती है?
माधव बोले अर्जुन से यही चीज तो पुरुष को मोक्ष ले जाती है
आसक्ति नाश और इन्द्रियसयंन नहीं होने से बड़ी हानी हो जाती है
फिर यही आसक्तियां बुद्धिमान पुरुष के मन को हर ले जाती हैं
लेकिन जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में हो जाती है वह
मेरे परायण होकर ध्यान में बैठने से उस की बुद्धि भी स्थिर हो जाती है
अर्जुन बोले माधव से भगवत परायण ना होने से क्या हानि है
मन और इन्द्रियों को वश में ना करने से क्या परेशानी है?
इसका उत्तर अब आगे दो श्लोक में बतलाया जाता है
विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्त हो जाता है
आसक्ति से उन विषयों की कामना को उत्पन्न कर जाता है
और कामना से विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न हो जाता है
फिर क्रोध से मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है
मूढ़भाव से स्मृति भ्रम हो जाता है
स्मृति भ्रम से बुद्धि और ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है
बुद्धि ज्ञान का नाश हो जाने से मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है
अब मैं पार्थ चौथे प्रश्न का उतर बतलाता हूँ
स्थिर बुद्धि पुरुष चलते कैसे है समझाता हूँ
अपने अधीन की हुई राग द्वेष से रहीत इन्द्रियों को जब वश में कर लेता है
तब वह अपने अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त हो जाता है
अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त हो जाने पर सभी दुखों का आभाव हो जाता है
फिर वह योगी अपनी बुद्धि को उस परमात्मा में स्थिर हो जाता है
लेकिन जिन्होंने मन इन्द्रियां वश में नहीं की उनकी बुद्धि कहीं स्थिर नहीं होती
उस आयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नही होती
और भावहीन मनुष्यों को कहीं शान्ति भी नहीं होती
शान्ति रहित मनुष्यों को सुख की प्राप्ति भी नहीं होती
और तो तुम्हे क्या बताऊ बताओं पार्थ
जो मनुष्य सम्पूरण कामनाओं का त्याग करता है
ममतारहित, अहंकार रहित और इच्छा रहित हुआ विचरता है
वही स्थिर बुद्धि शान्ति को प्राप्त होता है
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