थपेड़े बहुत सहे समुन्दर में लहरों के मैंने
लेकिन उस पार साहिल पे ना जा पाया मैं
जिंदगी में बिना काम के काम बहुत हैं
त्योहार पे इस बार भी घर ना जा पाया मैं
आज फिर से चली गयी वो मेरे सामने से
फिर इस बार भी इजहार नही कर पाया मैं
फिर एक दिन हिमत दिखा के मैंने बोल दी अपने दिल की बात
उस दिन खुद को इजहार करने से रोक न पाया मैं
चंद लम्हो में कर दिया फैसला मेरी महोबत का मेरे घरवालो ने
इस बार भी हद से नही गुजर पाया मैं
रिश्तोदारों का दबाव इतना था की संभलना मुश्किल था
शादी तय करदी मेरी इनकार कर न पाया मैं
सब कुछ होता चला गया बिना मेरी मर्जी से
वफादारी देखो मेरी तुझको भुला ना पाया मैं
चलो माना उसकी क्या गलती है इन सब मे
इसीलिए शायद नफरत आज भी उस से न कर पाया मैं
बहुत नाज से लेके आये थे उसको बहु बना कर
साँस बहू की नोक झोक में सुलह आज भी न करवा पाया मैं
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