जिसे चिंता रहती मेरी उनकी हर बातों में
वो गोद मे सर रख कर सुलाना रातों में
वो माँ की लोरी सुनके सपनो में खो जाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
वो डाटती भी और मारती भी थी हमको
ज़िद्द अच्छी नही होती समझाती थी हमको
फिर पेट में गुदगुदी करके रूठे हुए का मनाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
भाई बहनों का चलता था आपस मे रोना रुलाना
फिर अपने ही आँचल में माँ का सुलाना
गर्मियों की छुट्टियों में मामा के घर जाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
पर्स में पैसे बहुत है मेरे लेकिन वो तेरा छोटा पर्स नही मिलता
जिसमे से मैं 5 रुपये लेता था ice क्रीम के लिए वो रेहड़ी वाला नही मिलता
एक मीठास होती थी तेरी कड़वी बातों में
यहां आफिस में सिर्फ कड़वाहट है मीठी बातों में
अब आफिस की गलतियाँ छुपाये नही छुपती
कोई भी गलती हो आके निगाहें मुझपे ही टिकती
याद है मेरी गलतियों को तेरा पापा से छुपाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
अब हर जिद्द हर चाहत पूरी नही होती
लेट आऊं तो किसी को चिंता नही होती
जिंदगी की राहों में ना जाने किन किन से धोखें खाएं हैं
गैरों से ही नही अपनो से ज्यादा खाएं हैं।
आऊंगा जब इन सब की शिकायत करूँगा तुमको
सच्ची महोब्बत सिर्फ माँ होती है बताऊंगा तुमको
रोज क्या गुजरती है मुझपे अब और क्या बतलाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
वो चंदा चंदा कहके माँ का बुलाना
खुद चाहे 4 साल तक नए कपड़े न लें
पर हर त्योहार पे हमे नए कपड़े दिलवाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
लंच बॉक्स और पानी की बोतल अब भी लेके जाता हूँ मैं
अब रोज तैयार होके वक़्त से पहले office पहुच जाता हूँ मैं
याद है मुझे रोते हुए स्कूल ना जाने का बहाना बनाना
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
दुनिया की सुनते सुनते पक गया हूं मैं
इस मतलबी दुनिया की भाग दौड़ से थक गया हूँ मैं
माँ एक बार फिर से तेरे आँचल में सोना चाहता हूँ
जी भर के तेरी गोद मे रोना चाहता हूँ
फिर से मुझे चंदा कहके सीने लगाना
फिर से तेरी आखों के काजल का मुझे टीका लगाना
क्योंकि
याद आता है मुझे अपने बचपन का जमाना
तेरे हाथ की रोटी तेरे हाथों से खाना
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